वैष्णो देवी की गुफा में होने वाली आरती

हे मात मेरी, हे मात मेरी |
कैंसी यह देर लगाई है दुर्गे || १ ||

भवसागर में गिरा पड़ा हूँ |
काम आदि ग्रह में घिरा पड़ा हूँ |
मोह आदि जाल में जकड़ा पड़ा हूँ || २ ||

न मुझमें बल है न मुझमें विद्या |
न मुझमें भक्ति न मुझमें  शक्ति |
शरण तुम्हारी गिरा पड़ा हूँ || ३ ||

न कोई मेरा कुटुम्ब साथी |
ना ही मेरा शरीर साथी |
आप ही उबारो पकड़ के बहीं || ४ ||

चरण कमल की नौका बनाकर |
मैं पार हूंगा खुशी मनाकर |
यमदूतों को मार भगाकर || ५ ||

सदा ही तेरे गुणों को गाउँ |
सदा ही तेरे स्वरूप को ध्याऊँ
नित प्रति तेरे गुणों को  गाउँ || ६ ||

न मैं किसी का न कोई मेरा |
छाया है चारों तरफ अंधेरा |
पकड़ के ज्योति दिखा दो रस्ता || ७ ||

शरण पड़े हैं हम तुम्हारी |
करो यह नैया पार हमारी |
कैसी यह देर लगाई है दुर्गे || ८ ||